मानगढ़ को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दिया जाए -बांसवाड़ा डूंगरपुर सांसद कनकमल कटारा ने संसद में उठाई पूरजोर मांग

 

मानगढ़ को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा दिया जाए -बांसवाड़ा डूंगरपुर सांसद कनकमल कटारा ने संसद में उठाई पूरजोर मांग

-गोपेन्द्र नाथ भट्ट -

नई दिल्ली I बांसवाड़ा-डूंगरपुर के सांसद कनकमल कटारा ने राजस्थान और गुजरात सीमा पर दक्षिणी राजस्थान के बांसवाड़ा ज़िले की आनंदपुरी पंचायत समिति में मानगढ़ पहाड़ी पर आदिवासियों के सामाजिक एवं आध्यात्मिक 'भगत आन्दोलन' के धर्मगुरु गोविंद गुरु के नेतृत्व में लगे मेले और पवित्र धूणी पर श्रद्धान्वत हज़ारो की संख्या में एकत्रित लोगों के खिलाफ अंग्रेजों द्वारा लगभग 109 वर्ष पहले 17 नवम्बर 1913 को किये गए जलियावाला बाग हत्याकांड से भी बड़े नर संहार में बलिदान हुए करीब 1500 आदिवासियों की स्मृति में राजस्थान और गुजरात सरकार द्वारा बनाये गए गौरव स्थलों एवं स्मारकों को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा देने की मांग रखी है ।


कटारा ने गुरूवार को लोकसभा में नियम 377 के अंतर्गत यह मामला उठाया और कहा कि आज़ादी के अमृत महोत्सव पर शहीदों को इससे बड़ी श्रद्धांजली और कोई नहीं हो सकती है । उन्होने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मानगढ़ पहाड़ी पर शहीदों की इस ऐतिहासिक स्थली के विकास में गहरी रुचि लेकर अपने प्रदेश की सीमा में भव्य स्मारक बनवाया । इससे ठीक सटी हुई पहाड़ी पर राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने भी इसी प्रकार के स्मारक का विकास और पैनोरमा सामुदायिक भवन निर्माण और गोविंद गुरु के साथ भगत आंदोलन और शहादत से जुड़े प्रसगों का सुन्दर चित्रण आदि कार्य कराये गए है । कालान्तर में सभी राज्य सरकारों ने इस पवित्र और बलिदानी भूमि के विकास पर ध्यान दिया गया है फलस्वरूप यह ऐतिहासिक स्थल लोगों के लिए प्रेरणादायी और इतिहास में रुचि रखने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षक पर्यटन स्थल भी बन गया है । साथ ही प्रतिवर्ष हज़ारों श्रद्धालु इस पवित्र भूमि और धूणी के दर्शनार्थ यहाँ आते हैं । 

सांसद कटारा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री और संस्कृति मंत्री से सदन के माध्यम से अनुरोध किया कि मानगढ़ के ऐतिहासिक स्थल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करते हुए दोनों प्रदेशों की सांझा परम्परगत आदिवासी संस्कृति तथा ऐतिहासिक स्मारकों के संवर्धन के प्रयासों को और तेज किया जाना चाहिए।  



उल्लेखनीय हैं कि 17 नवम्बर 1913 को मानगढ़ में भील समुदाय के हज़ारों लोगों को अंग्रेज़ सरकार ने गोली बरसाकर हत्या कर दी थी। इसे ही मानगढ़ नरसंहार कहा जाता हैं।स्थानीय लोग इस घटना को जलियावाला बाग हत्याकांड के समरूप बताते हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अमृतसर के जलियांवाला बाग कांड की खूब चर्चा होती है; पर मानगढ़ नरसंहार को संभवतः इसलिए भुला दिया गया, क्योंकि इसमें बलिदान होने वाले लोग निर्धन वनवासी थे।


मानगढ़, दक्षिणी राजस्थान में बांसवाड़ा जिले का एक पहाड़ी क्षेत्र है। यहां मध्यप्रदेश और गुजरात की सीमाएं लगती हैं। यह सारा क्षेत्र वनवासी बहुल है। मुख्यतः यहां भील आदिवासी रहते हैं। बताया जाता हैं कि आजादी से पूर्व स्थानीय सामन्त, रजवाड़े तथा अंग्रेज इनकी अशिक्षा, सरलता तथा गरीबी का लाभ उठाकर इनका शोषण करते थे। वनवासियों में फैली कुरीतियों तथा अंध परम्पराओं को मिटाने के लिए गोविन्द गुरु के नेतृत्व में एक बड़ा सामाजिक एवं आध्यात्मिक आंदोलन हुआ था जिसे 'भगत आन्दोलन' कहते हैं।गोविन्द गुरु का जन्म 20 दिसम्बर, 1858 को डूंगरपुर जिले के बांसिया (बेड़िया) गांव में हुआ था ।


गोविंद गुरु ने 1890 के दशक में यह आंदोलन शुरू किया था। आंदोलन में अग्नि को प्रतीक माना गया था। अनुयायियों को अग्नि के समक्ष खड़े होकर धूनी करना होता था। उन्होने1883 में ‘सम्प सभा’ की स्थापना की। इसके द्वारा उन्होंने शराब, मांस, चोरी, व्यभिचार आदि से दूर रहने; परिश्रम कर सादा जीवन जीने; प्रतिदिन स्नान, यज्ञ एवं कीर्तन करने; विद्यालय स्थापित कर बच्चों को पढ़ाने, अपने झगड़े पंचायत में सुलझाने, अन्याय न सहने, अंग्रेजों के पिट्ठू जागीरदारों को लगान न देने, बेगार न करने तथा विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी का प्रयोग करने जैसे सूत्रों का गांव-गांव में प्रचार किया।


कुछ ही समय में लाखों लोग उनके भक्त बन गये। प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा को सभा का वार्षिक मेला होता था, जिसमें लोग हवन करते हुए घी एवं नारियल की आहुति देते थे। लोग हाथ में घी के बर्तन तथा कन्धे पर अपने परम्परागत शस्त्र लेकर आते थे। मेले में सामाजिक तथा राजनीतिक समस्याओं की चर्चा भी होती थी। इससे वागड़ का यह वनवासी क्षेत्र धीरे-धीरे ब्रिटिश सरकार तथा स्थानीय सामन्तों के विरोध की आग में सुलगने लगा।

17 नवम्बर, 1913 (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) को मानगढ़ की पहाड़ी पर वार्षिक मेला होने वाला था। इससे पूर्व गोविन्द गुरु ने शासन को पत्र द्वारा अकाल से पीड़ित वनवासियों से खेती पर लिया जा रहा कर घटाने, धार्मिक परम्पराओं का पालन करने देने तथा बेगार के नाम पर उन्हें परेशान न करने का आग्रह किया था; पर अंग्रेजी प्रशासन ने इस पहाड़ी को घेरकर मशीनगन और तोपें लगा दीं। इसके बाद उन्होंने गोविन्द गुरु को तुरन्त मानगढ़ पहाड़ी छोड़ने का आदेश दिया। उस समय तक वहां लाखों भगत आ चुके थे। पुलिस ने कर्नल शटन के नेतृत्व में गोलीवर्षा प्रारम्भ कर दी, जिससे हजारों लोग मारे गये। इनकी संख्या 1,500 से तक कही गयी है।


पुलिस ने गोविन्द गुरु को गिरफ्तार कर पहले फांसी और फिर आजीवन कारावास की सजा दी। 1923 में जेल से मुक्त होकर वे भील सेवा सदन, झालोद के माध्यम से लोक सेवा के विभिन्न कार्य करते रहे। 30 अक्तूबर, 1931 को ग्राम कम्बोई (गुजरात) में उनका देहान्त हुआ। प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष पूर्णिमा को वहां बनी उनकी समाधि पर आकर लाखों लोग उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हैं।



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