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    विवेकानंद ने दीवान से कहा था-राजा की तस्वीर पर थूको:महल की जगह छोटे कमरे में रहे, गुफा में तपस्या की; पढ़ें राजस्थान से जुड़े किस्से

    1 day ago

    आज स्वामी विवेकानंद की जयंती है। स्वामी विवेकानंद का राजस्थान से एक खास रिश्ता था। साल 1893 में शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में शामिल होने से करीब दो साल पहले वह अलवर, जयपुर, खेतड़ी (झुंझुनूं), अजमेर और माउंट आबू आए थे। खेतड़ी के महाराजा ने उनकी शिकागो यात्रा का पूरा खर्च उठाया था और पगड़ी पहनाई थी। अलवर में दोस्त लाला गोविंद सहाय के साथ स्वामी विवेकानंद की बातचीत काफी चर्चित है। स्वामी विवेकानंद अलवर के राजा से भी मिले थे। राजा के सामने ही उन्होंने दीवान को फोटो पर थूकने के लिए बोल दिया था। जयपुर में सेनापति हरि सिंह का मन बदल दिया था। वहीं, माउंट आबू की एक गुफा में तपस्या करने लगे थे। फिर एक मुस्लिम वकील के घर भोजन करने पहुंचे थे। आज विवेकानंद जयंती पर पढ़िए राजस्थान से जुड़े किस्से... स्वामी विवेकानंद 1891 में अलवर पहुंचे थे, जो शिकागो यात्रा से दो साल पहले की बात है। वे राजा के महल में ठहरने के बजाय अशोका टॉकीज के पास अपने दोस्त लाला गोविंद सहाय के घर के छोटे से कमरे में दो बार 10-10 दिन तक रुके थे। यह कमरा आज भी 'स्वामी विवेकानंद प्रवास स्थल' के नाम से जाना जाता है, जहां संकरी गली की दीवार पर 'स्वामी विवेकानंद प्रवास स्थल' लिखा हुआ है। विवेकानंद ने दोस्त गोविंद सहाय को लिखे थे 7 पत्र अलवर के राजा मंगल सिंह के दीवान मेजर राजचंद्र ने स्वामी विवेकानंद को घर ले जाकर उन्हें सूचना दी। राजा ने विवेकानंद से मिलकर पूछा कि वे इतने विद्वान होने के बावजूद भिक्षा क्यों मांगते हैं? विवेकानंद ने जवाब दिया कि जैसे महाराज को शिकार पसंद है, वैसे ही उन्हें घूमना-फिरना अच्छा लगता है। फिर राजा ने मूर्तिपूजा पर सवाल उठाया। विवेकानंद ने दीवार पर टंगी राजा की फोटो उतारी और दीवान से कहा, "इस पर थूकिए!" सब चकित रह गए। विवेकानंद ने समझाया कि जैसे यह फोटो महाराज का प्रतिबिंब है और लोग इसका सम्मान करते हैं, वैसे ही मूर्ति भगवान की स्मृति कराती है। राजा इतने प्रभावित हुए कि हाथ जोड़कर बोले, "आपने मेरी आंखें खोल दीं!" विवेकानंद ने कहा- "कृपा तो केवल भगवान कर सकते हैं।" अलवर से जाते समय विवेकानंद ने लाला गोविंद सहाय को 7 पत्र लिखे थे, जो आज उनके पोते के पास सुरक्षित हैं। एक पत्र में लिखा- "अलवर के युवकों, तुम सभी योग्य हो। समाज और जन्मभूमि के कल्याण के लिए काम करो। धक्के लगें तो विचलित मत होना।" अन्य पत्रों में उन्होंने जप करने, हिंदू धर्म के प्रचार, संस्कारों और साधुता की बात की। एक में कहा- "भगवान का अन्वेषण पहले करो, बाकी सब स्वतः मिल जाएगा। सच्चा बनना और सच्चा बर्ताव ही सब कुछ है।" अलवर से विवेकानंद जयपुर पहुंचे, जहां प्रधान सेनापति सरदार हरि सिंह से उनका परिचय हुआ। हरि सिंह मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं करते थे। मूर्तिपूजा पर विवेकानंद की कई घंटे की चर्चा सुनने के बाद भी सरदार हरि सिंह का मन नहीं बदला। शाम को बाजार में श्रीकृष्ण की प्रतिमा लेकर कीर्तन का दल निकल रहा था। उसी समय विवेकानंद ने हरि सिंह को स्पर्श कर कहा- देखिए, 'कैसा चैतन्य जीवंत ईश्वर है'। हरि सिंह की आंखों से आंसू बहने लगे और बोले- "स्वामीजी, मेरी आंखें खुल गईं। जो घंटों विवेचन से समझ नहीं पाया, आपके स्पर्श करने से हो गया। मैंने प्रतिमा में भगवान के दर्शन किए हैं।" जयपुर से अजमेर और फिर आबू पर्वत पहुंचे थे विवेकानंद जयपुर से विवेकानंद अजमेर आ गए थे। वहां अकबर का महल देखा। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती साहब की दरगाह देखने गए थे। पुष्कर, सावित्री मंदिर, ब्रह्मा मंदिर गए थे। गर्मियों के दिन आने पर विवेकानंद आबू पर्वत पहुंचे थे। फिर दिलवाड़ा जैन मंदिर गए और वहां एक विशाल झील पर घूमने लगे। एक गुफा में तपस्या की, जहां उनके पास सिर्फ दो कंबल, कमंडल और कुछ पुस्तकें थीं। यहां वे शिलाखंडों पर बैठकर घंटों गीत गाते रहे, जिससे वहां घूम रहे यूरोपीय पर्यटक भी आकर्षित हुए। खेतड़ी महाराजा ने पहनाई पगड़ी, शिकागो यात्रा का खर्च भी उठाया स्वामी विवेकानंद खेतड़ी को अपना दूसरा घर मानते थे। महाराजा अजीत सिंह को अपना 'मित्र' कहते थे। महाराजा अजीत सिंह ने उनके शिकागो जाने की पूरी व्यवस्था की थी, जिसमें यात्रा का खर्च और केसरिया अचकन व साफे का प्रबंध शामिल था। उनके सम्मान में खेतड़ी में 'रामकृष्ण मिशन विवेकानंद स्मृति मंदिर' और 'अजीत विवेकानंद संग्रहालय' है, और हर साल 12 दिसंबर को 'खेतड़ी विरासत दिवस' मनाया जाता है। बता दें कि 7 अगस्त 1891 से 27 अक्टूबर 1891 तक (लगभग 82 दिन) विवेकानंद खेतड़ी में रहे थे। यहीं महाराजा अजीत सिंह से उनकी पहली मुलाकात हुई और गहरी दोस्ती हुई। उन्होंने यहीं व्याकरण का अध्ययन किया और पगड़ी पहनने की प्रथा अपनाई। 21 अप्रैल 1893 से 10 मई 1893 तक वे एक बार फिर खेतड़ी में रहे। तब वे महाराजा के पुत्र के जन्म के अवसर पर आशीर्वाद देने आए थे। इसी दौरान उनके सचिव ने शिकागो यात्रा के लिए प्रथम श्रेणी का टिकट खरीदा। 12 दिसंबर 1897 से 21 दिसंबर 1897 तक तीसरी बार खेतड़ी में रहे। अमेरिका से लौटने के बाद यहां उनका शाही स्वागत हुआ। सार्वजनिक भाषण दिए। इसी दौरान उन्होंने बेलूर (पश्चिम बंगाल) मठ के लिए भी महाराजा अजीत सिंह से सहायता ली। मुसलमान वकील के घर गए थे विवेकानंद आबू पर्वत पर तपस्या के समय वहां से एक राजा के मुसलमान वकील गुजर रहे थे। विवेकानंद काे देखकर वह आकर्षित हुए। वह कई दिन विवेकानंद के पास रुके। विवेकानंद ने उनसे कहा कि वकील साहब इस गुफा में दरवाजा नहीं है। इच्छा हो तो किवाड़ लगवा सकते हैं। इस पर वकील ने कहा कि गुफा बदतर हाल में है। आप आज्ञा देते तो मैं चाहता हूं आप मेरे घर चलें। मैं मुसलमान हूं। लेकिन आपके भोजन की व्यवस्था अलग करूंगा। इन सब बातों पर ध्यान दिए बिना विवेकानंद उनके घर चले गए। विवेकानंद का उदार स्वभाव सभी को छू गया। अब पढ़ें लाला गोविंद सहाय को भेजे पत्रों में लिखी कुछ मुख्य बातें...
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