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    डांस करने वाले पूर्व विधायक को चाहिए टिकट:महेंद्रजीत मालवीया ने क्यों मांगा समर्थन; भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ने गाना गाया

    23 hours ago

    नमस्कार अलवर में वन मंत्री ने सितोलिया खेला तो जयपुर में बीजेपी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया ने गाना गाया। बाड़मेर में पूर्व विधायक ने पीसीसी चीफ से टिकट को लेकर चर्चा की। बांसवाड़ा में कांग्रेस में घर वापसी करने वाले नेताजी ने ACB रेड को लेकर बयान दिया और उदयपुर में मेघालय की टूरिस्ट ने मायड़ में बात की। राजस्थान की राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में... 1. वन मंत्री ने खेला सितोलिया, पूनियाजी ने गाया गीत माननीयों में विटामिन-D ऑब्जर्व करने की खूब होड़ लगी। अधिकतर ने जनवरी की गुनगुनी धूप में पतंगबाजी का आनंद लिया। राजनीति के नए खिलाड़ी इस खेल से बहुत कुछ सीख सकते हैं। पतंगबाजी का खेल हवा का रुख भांपना, कब ढील देनी है, कब खींचना है, किसकी चरखी पकड़नी है और किसकी डोर काटनी है, ये सारे दांव-पेंच सिखा देता है। भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष पूनियाजी का सुरीला अवतार सामने आया। जब से बिहार का किला फतेह हुआ है, उनका संगीत के प्रति प्रेम बढ़ गया है। छत पर पतंग उड़ाने के बाद माननीय ने माइक थामा और किशोर कुमार का गीन गुनगुनाया- ओ मेरे दिल के चैन, चैन आए मेरे दिल को दुआ कीजिए। खेल के मामले में वन मंत्री भी पीछे नहीं रहे। अलवर में मकर संक्रांति पर पतंग नहीं उड़ाई जाती। सितोलिया खेला जाता है। वन मंत्री ने भी सितोलिया खेला। सहयोगियों ने पिट्‌ठू जमाए। मंत्रीजी ने खूब निशाना साधा। पिट्‌ठू का पिलर ढेर हो गया। राजनीति में भी माहिर खिलाड़ियों का निशाना ऐसा ही होता है। 2. डांस से मशहूर होने के बाद फिर टिकट की चर्चा जैसलमेर से कांग्रेस के पूर्व विधायक रूपाराम धनदेव 70 बसंत देख चुके हैं। लेकिन राजनीति में रहकर किसी ने टिकट के ख्वाब नहीं देखे तो खाक राजनीति में रहे। माननीय ने जब से नये साल की पार्टी और जिलाध्यक्षजी की बर्थ-डे पार्टी में डांस किया है, तब से उनकी टिकट की उम्मीद बढ़ गई है। वे कांग्रेस के जिस बड़े नेता से मिल रहे हैं, उसी से टिकट की बात कर रहे हैं। माननीय यह मानकर चल रहे हैं कि उनके डांस की परफॉर्मेंस जोरदार थी। इसलिए टिकट बनता है। चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन टिकट की रणनीति पर काम शुरू हो चुका है। हालांकि, यह टिकट डांस इंडिया डांस या इंडिया गोट टैलेंट जैसे टीवी कार्यक्रमों का नहीं है। मामला विधानसभा चुनाव के टिकट का है। ऐसे में बाड़मेर की जनाक्रोश रैली से फुरसत पाते ही धनदेव जी ने बात सीधे डोटासरा जी के कानों तक पहुंचा दी। डोटासरा जी ने भी माननीय को मायूस नहीं किया। बल्कि यह तक कह दिया कि आपकी टिकट कौन काट रहा है, हमें बताओ, हम पहले ही उसकी टिकट काट देते हैं। 3. महेंद्र जीत मालवीया का 'दर्द' उनका नाम महेंद्र जीत मालवीया है। वे बड़े आदिवासी नेता हैं। वे कांग्रेस में थे। पार्टी ने थाल में सजा-सजाकर उन्हें लोकसभा और विधानसभा के टिकट दिए। वे जीते भी। सांसद भी रहे और चार बार विधायक भी रहे। उनकी पत्नी भी बांसवाड़ा जिले की प्रमुख रहीं। पार्टी से इतना कुछ पाकर भी उनके मन में बेचैनी रही। बेचैनी का कारण आदिवासियों का उत्थान न कर पाना नहीं था। वे चाहते थे कि पार्टी उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाए। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। जैसा कि नियम है कि दिग्गज नेता को चुनाव से ठीक पहले पाला बदलना चाहिए। ताकि दूसरे पाले से इनाम के तौर पर टिकट मिल जाए। मालवीया जी ने भी कांग्रेस से नाराज होकर पाला बदल लिया। लोकसभा का टिकट पाने के लिए उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। भाजपा ने लोकसभा का टिकट थमाया। लेकिन चुनावी मैदान में BAP के राजकुमार रोत ने उनको तगड़ी पटखनी दी। अब मालवीया जी क्या करते? दो साल तक भगवा पार्टी का पटका गले में डालकर घूमते रहे। फिर जब दोबारा उनका मन बेचैन हुआ तो भाजपा छोड़ कांग्रेस में पहुंच गए। इत्तेफाक से पाला बदलने के दो दिन बाद ही उनके तीन ठिकानों पर एसीबी ने रेड मार दी। मालवीया जी को आपदा में अवसर मिल गया। अपने पुराने कार्यकर्ताओं के बीच जाकर बोले- मुश्किल घड़ी में आपका समर्थन चाहिए। तंग किया गया तो कार्यकर्ता सड़कों पर उतर जाएंगे। 4. चलते-चलते.. तो क्या हुआ कि राजस्थानी कोई भाषा ही नहीं है? तो क्या हुआ कि इसे संविधान की अनुसूची में शामिल नहीं किया गया? तो क्या हुआ कि राजस्थान विश्वविद्यालय में राजस्थानी पढ़ने के लिए 55 हजार रुपए जेब में होना जरूरी है, जबकि जर्मन-फ्रेंच के लिए 5 हजार में काम चल जाएगा। तो क्या हुआ कि घर में बच्चा मायड़ बोली में बात करे तो बड़े टोकते हैं-गंवार ही है क्या? तो क्या हुआ कि राजस्थान में हर 8 किलोमीटर पर बोली बदल जाती है। इतने 'क्या' के बावजूद मायड़ बोली की मिठाई कतई कम नहीं होती, खासतौर से जब यह बोली कोई और बोलता है। मेघालय से फ्लोरीन मैडम दोस्तों के संग घूमने के लिए झीलों की नगरी पहुंचीं। उन्होंने स्थानीय बोली में दिलचस्पी दिखाई। लोकल लोगों से कुछ शब्द सीखे। फिर झील किनारे बैठकर मायड़ बोली में संवाद अदायगी की। उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर छा गया है। खूब वायरल हो रहा है। अपने बच्चों को मायड़ बोली पर टोकने वाले भी फ्लोरीन के लहजे पर फिदा हो रहे हैं। (इनपुट सहयोग- स्मित पालीवाल (जयपुर), विजय कुमार (बाड़मेर), संजय पटेल (बांसवाड़ा), अनूप पाराशर (उदयपुर)।) वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल मुलाकात होगी...
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